Tactical Movement: Vistaar Mein Jankari

Tactical Movement: Vistaar Mein Jankari 1. Definition (Pari-bhasha) Dushman ke ilake mein ek jagah se doosri jagah tak surakshit pahunchne ke liye, jo dhang aur rules (principles) ek team ya toli apnati hai, use Tactical Movement kehte hain. Iska mukhya uddeshya dushman ki nazaron se bachkar apne mission ko pura karna hota hai. 2. Tactical Movement ke Fayde (Benefits) Command & Control: Commander apni toli par behtar niyantran rakh sakta hai. Suraksha: Dushman ki nazar aur achanak hamle (Ambush) se bacha ja sakta hai. Counter Ambush: Agar dushman hamla kare, to turant palatwar (Pratighat) karne ki kshamta rehti hai. Coordination: Jawano ke beech aapsi talmel (Mutual Support) bana rehta hai. 3. Tactical Movement ke Sidhant (Principles) Yahan aapke dwara bataye gaye points ka sankshipt vivaran hai: Sl. No Point Description 1 Order of Movement Ismein Scout, Section Commander, 2I/C aur baaki jawano ka kram (sequence) tay hota hai. 2 Observation Scout 1 & 2 aage ka 180^\circ area de...

प्रथम विश्वयुद्ध - First World War [1914-18]

 


प्रथम विश्वयुद्ध की भूमिका (Background of First World War)

1914-18 ई. का प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) साम्राज्यवादी राष्ट्रों की पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम था. प्रथम विश्वयुद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण गुप्त संधि प्रणाली थी. यूरोप में गुप्त संधि की प्रथा जर्मन चांसलर बिस्मार्क ने शुरू की थी. इसने यूरोप  को दो विरोधी गुटों में विभाजित कर दिया. दो गुटों के बीच एक-दूसरे के प्रति संदेह और घृणा का भाव बढ़ता गया. राजनीतिक वातावरण दूषित हो गया. 1879 ई. में जर्मनी ने ऑस्ट्रिया-हंगरी (Austria-Hungary) के साथ गुप्त संधि की. 1882 ई. में इटली भी इस गुट में शामिल हो गया. इस प्रकार त्रिगुट का निर्माण हुआ. 1887 ई. में जर्मनी और रूस दोनों मिल गए. विश्व राजनैतिक अखाड़े में फ्रांस अकेला पड़ गया. फ्रांस को अपमानित करने के लिए ही जर्मनी ने इन देशों के साथ संधि की थी. फ्रांस प्रतिशोध की आग में अन्दर ही अन्दर जल रहा था. इसलिए 1894 ई. में फ्रांस ने रूस से संधि की. उधर इंग्लैंड ने 1902 ई. में जापान के साथ, 1904 ई. में फ्रांस और 1907 ई. में रूस के साथ संधि कर ली.  इस प्रकार दो राजनीतिक खेमों में बँटा यूरोप युद्ध का अखाड़ा हो गया.

एक ओर इंग्लैंड, फ्रांस, रूस और जापान का त्रिगुट था और दूसरा गुट जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी, इटली और तुर्की का था. दोनों के बीच हथियारबंदी की होड़ चल रही थी.

1912-13 ई. के बाल्कन युद्धों (War in the Balkans) ने तो प्रथम विश्वयुद्ध को अनिवार्य बना दिया. यूरोप के अनेक राष्ट्र बाल्कन क्षेत्र में अपने साम्राज्य के विस्तार का प्रयास कर रहे थे. ऑस्ट्रिया और रूस भी इसी क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहते थे. बाल्कन क्षेत्र में साम्राज्यवादी प्रतिद्वंदिता ने विश्वयुद्ध की भूमिका तैयार की.

गुप्त संधियों के अलावे प्रथम विश्व युद्ध के अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं -

Causes of World War I

1. उग्र राष्ट्रीयता (Furious Nationality)

उग्र राष्ट्रीयता के कारण भी प्रथम विश्वयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई थी. बड़े एवं शक्तिशाली राष्ट्रों के अतिरिक्त यूनान और सर्बिया जैसे छोटे-छोटे देशों पर भी उग्र राष्ट्रीयता का नशा चढ़ा हुआ था. वे वृहत्तर यूनान, वृहत्तर बुल्गेरिया और वृहत्तर सर्बिया की मांग कर रहे थे. चेक, स्लाव जातियाँ अपनी राष्ट्रीय आकांक्षा को पूरा करने के लिए यूरोप में अशांति उत्पन्न कर रही थीं. जब यूरोप के साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी सभ्यता-संस्कृति और धर्म का पाठ पढ़ाने के लिए संसार में आगे बढ़े तो उनमें संघर्ष अनिवार्य हो गया.

2. आर्थिक प्रतिद्वंदिता (Economic Rivalry)

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप यूरोप के राष्ट्रों के आर्थिक जीवन में महान् परिवर्तन हुआ. पूंजीवाद की उत्पत्ति हुई. पूँजीवादी अतिरिक्त पूँजी लगाने के लिए उपनिवेश की माँग करने लगे. बढ़ती हुई जनसंख्या को बसाने के लिए भी उपनिवेश की आवाश्यकता थी. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार से ही संभव था. इसलिए उपनिवेश को लेकर ही संघर्ष प्रारम्भ हुआ. पूँजीवादी राष्ट्रों के बीच आर्थिक महत्त्वाकांक्षा के कारण घृणा और अविश्वास का वातावरण तैयार हो गया.

3. साम्राज्यवादी होड़ (Imperialist Competition)

साम्राज्यवादी होड़ प्रथम विश्वयुद्ध का एक आधारभूत कारण था. औद्योगिक क्रान्ति के कारण यूरोपीय देशों के सामने व्यावसायिक माल की खपत और कल-कारखानों को चलाने के लिए कच्चे माल की प्राप्ति की समस्या उत्पन्न हुई. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार में दिखाई दिया. इसलिए इंग्लैंड, फ्रांस, हॉलैंड, बेल्जियम, पुर्तगाल, डेनमार्क, इटली अपना साम्राज्य बढ़ाने का प्रयत्न करने लगे. इससे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता बढ़ी. अफ्रीका और चीन इस प्रतिद्वंद्विता का शिकार पहले हुए. सूडान को लेकर इंग्लैंड और फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ते-छिड़ते बचा.

4. सैन्यवाद और शस्त्रीकरण (Militarism and Armament)

उग्र राष्ट्रीयता और साम्राज्यवादी मनोवृत्ति ने यूरोप के राष्ट्रों का ध्यान सैन्यवाद और शस्त्रीकरण की ओर खींचा. फ्रांस, जर्मनी आदि साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी आमदनी का 85% सैनिक तैयारी पर खर्च करने लगे. भय तथा संदेह ने प्रत्येक राष्ट्र को युद्ध-सामग्री जमा करने के लिए उत्प्रेरित किया और इस तरह प्रत्येक देश युद्ध के लिए तैयार हो गया.

5. समाचारपत्रों का झूठा प्रचार (Newspapers' False Propaganda)

प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व सभी देशों के समाचारपत्र एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे थे. इससे एक-दूसरे की राष्ट्रीय भावना को ठेस लग रही थी. कभी-कभी दो राष्ट्रों के बीच विवादास्पद प्रश्न पर समाचारपत्रों में इस तरह की आलोचना की जाती थी कि जनता पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता था.

6. फ्रांस की बदले की भावना (France's Revenge Spirit)

जर्मनी का एकीकरण फ्रांस को पराजित कर के पूरा किया गया था. फ्रांस को अल्सस-लारेन का प्रदेश खोना पड़ा था. फ्रांस राष्ट्रीय अपमान को भूला नहीं था और वह जर्मनी से बदला लेना चाहता था. जर्मनी मोरक्को में फ्रांस का विरोध कर रहा था. इससे दोनों में मनमुटाव पैदा हुआ.

7. अंतर्राष्ट्रीय अराजकता (International Anarchy)

इस समय यूरोप में एक प्रकार से अंतर्राष्ट्रीय अराजकता फ़ैल चुकी थी. प्रत्येक राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा था. अपने हितों की रक्षा के लिए कोई भी देश अपने विरोधी के साथ संधि कर सकता था. स्वार्थी राष्ट्र की इस नीति ने विरोधाभास को जन्म दिया. इस परिस्थिति को रोकने के लिए कोई अंतर्राष्ट्रीय संस्था नहीं थी जिसके अभाव के कारण सभी राष्ट्र मनमानी कर रहे थे.

8. सराजेवो हत्याकांड (Sarajevo Assassination)

युद्ध का तात्कालिक कारण ऑस्ट्रिया (Austria) के राजकुमार आर्कड्यूक फ्रान्ज़ (Archduke Franz) की हत्या थी. राजकुमार की हत्या बोस्निया (Bosnia) की राजधानी सराजेवो (Sarajevo) में हुई थी. ऑस्ट्रिया की सरकार ने राजकुमार की हत्या के लिए सर्बिया को उत्तरदाई ठहराया और उसके समक्ष 12 कड़ी शर्तें रखीं. सर्बिया की सरकार ने सभी शर्तों को मानने में अपनी असमर्थता प्रकट की. सर्बिया की सरकार समस्या का समाधान महाशक्तियों के सम्मलेन द्वारा करना चाहती थी. किन्तु ऑस्ट्रिया के राजनीतिज्ञों और सैनिक पदाधिकारियों ने सर्बिया की प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया. ऑस्ट्रिया की सरकार ने 28 जुलाई, 1914 ई. को युद्ध की घोषणा कर अपनी सेना को सर्बिया पर आक्रमण करने का आदेश दिया. इस घटना से ही प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई. युद्ध की समाप्ति 11 नवम्बर, 1918 को हुई.

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